Kaavyanjali Ek Saprem Bhent............









 

                                                                    

वक़्त  का कारवाँ फिर  बढा, मैं फिर  अकेला बढ़  गया
रौशनी में सब  साथ  थे, अँधेरे में मेरा साया भी कही खो गया 
सारे चेहरे खुश  थे कितने, थे वो मेरे साथ  खड़े,
जो हमने थोडा मुस्करा दिया, तो क्यूँ थे वो पीछे खड़े 
रुक  नहीं सकता था मैं, जब  वो भीड़   पीछे रुक  गया 
वक़्त  का कारवाँ फिर  बढ़ा, मैं फिर  अकेला बढ़  गया 

एक  मोड़ पर  थे कुछ  दोस्त  बने, कहने को साथ  चलने लगे  
जिंदगी थोड़ी रंगीन  हुई, मंजिलो की दूरी थे घटने  लगे 
सारे कंधे साथ  थे अब , थी नयी एक  रफ़्तार  भी 
थे  कदम  अब  साथ  बढ़ने, खाई  हो या बीच  मंझधार  भी 
जो रास्ते मेरे  कांटे आये, तो हर  कदम  क्यूँ मुड  गया 
वक़्त का कारवाँ फिर  बढ़ा , मैं फिर  अकेला बढ़  गया 

थोड़ी दूर मैं और  बढ़ा, फिर एक  मीठी आवाज़  आई 
मैं भी तेरे साथ  चलूंगी, कह पीछे धुंध  से वो भागी आई 
ख़ुशी में संग  थे बढ़ने लगे हम, जैसे अब  तक  थी यही- कही वो 
चार  कदम  में ढेरो यादें देकर , हाथ  छुडा खो गयी कही वो 
बैठ  वही रुक  थोडा रोया, फिर  सोचा जाने दूँ जो गुजर  गया 
वक़्त  का कारवां फिर  बढ़ा, मैं फिर  अकेला बढ़  गया 

वो जो कही ऊपर है बैठा, उसको अब  यही चुनौती दूंगा,  
तेरे रास्ते अब  तक  चलता आया, अब अपना रास्ता खुद  ढुदुगा
सारी  उम्मीदें सारे सपने बटोरे, फिर वही पुराने कदम  बढ़ाये
कदमो ने भी भरी सिसकियाँ, जब रास्ते केवल कांटे आये 
अब ये  इंसा फिर न हारेगा, कर्म को ले फिर  किस्मत  से लड़ गया
वक़्त  का कारवाँ फिर  बढ़ा, मैं फिर  अकेला बढ़  गया 

चलते चलते थक  गया मैं, कदम  फिर  भी बढ़ते गए
इस  पार  बस  मैं ही आया, अपने थे सारे पीछे रह  गए 
इस  अकेली चाल  पे,  वो कांटे भी शर्मा गए ,
पछतावे में वो फूल बनकर , मेरे कदमो के नीचे आ गए 
जीतना ही था मुझे जब  ,तो वो हार  पीछे रह  गया 
वक़्त  का कारवाँ फिर  बढ़ा, मैं फिर  अकेला बढ़  गया


Updated: Aug-2010

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