Kaavyanjali Ek Saprem Bhent............









 

                                      

औरत तेरे रूप अनेक मैंने देखे
मैंने एक माँ को तुझमे देखा
मैंने एक बहिन को तुझमे देखा
मैंने एक बेटी को तुझमे देखा
मैंने आदि शक्ति को तुझमे देखा
मैंने दया की देवी को तुझमे देखा
मैंने घर की लक्ष्मी को तुझमे देखा
तू बेटी के रूप में घर को खिलखिलाती है
अपनी माँ का हमेशा काम में हाथ बटाती है
और अपने बापू को अपनी चंचलता से चहकाती है
कभी- कभी अपने भाइयो को गुड़िया का एहसास कराती है
तो कभी अपने भाई को माँ का भी एहसास कराती है
और एक दिन वो भी आता है,जब तू घर छोड़कर चली जाती है
और सबको बहुत रुलाती है
तू बहु के रूप में सारे घर को संजोती है
घर के एक एक मोती को एक धागे में पिरोती है
ओ त्याग की प्रतिमा, न जाने तू कैसे अपना घर- बार छोड़ आती है
और आकर इस नए घर में इतना प्यार से घुल - मिल जाती है
पत्नी के रूप में सारी जिन्दगी एक आदमी के नाम लिख देती है
एक अनजाने आदमी को न जाने कैसी अपना प्राणेश्वर बना देती है
उसके दुःख-सुख को अपने जीवन में जगह देती है
उसके कदमो को अपने माथे पर जगह देती है
जब वो देर से आता है,तो चौखट पर राह ओटती है
जब वो दर्द से करहाता है,तो उसके सर और पैर दबाती है
जब वो प्यार देता है, तो प्यार और इज्जत से उसका धन्यवाद करती है
जब वो दुःख देता है तो आशीर्वाद समझकर उसका धन्यवाद करती है
जब वो अपने फर्ज से चूक जाता है,
तब बहाने बना कर उसके कर्म छुपाती है
जब एक रात वो कहीं और से आता है,
तब अपने पल्लू से आँखे पोछते हुए उसके लिए बिस्तर लगाती है
तू माँ के रूप में कुल के भविष्य को संभालती है
अपने प्यार और दुलार से उन्हें जीने की राह दिखलाती है
अपना पेट काट कर भी बच्चो को पुरा निवाला खिलाती है
अपने आंसू रोक कर भी ,उन मासूमो को हँसाती खिलखिलाती है
इतना दिल तो बस तेरे ही अन्दर है,
अपने डाकू बेटे को अपनी आँखों का तारा बताती है
अपने खाली बैठे बेटे को भी अपना राजा बेटा बताती है
मन करता है तेरे चरणों में सारी जिन्दगी लिखता रहूँ
मन करता है सारी जिन्दगी तेरे गुणों का गुणगान करता रहूँ
मन करता है तुझे हमेशा शत शत प्रणाम करता रहूँ

Updated: Mar-2009

Email : vishwas@kaavyanjali.com