Kaavyanjali Ek Saprem Bhent............









 

                                   

ना तुझे खोना है, ना तुझे पाना है |
तेरे तन से तो मैं हूँ रूबरू, अब तुझे रूह में बसाना है |
तेरी धडकनों को तो मैं सुन ना सका |
पर अब तेरे अक्स को आजमाना है |
घुप अँधेरे में खड़े इस सूखे पेड़ को |
अब ज़िन्दगी की रौशनी से नहाना है |
हाँ मुझे, तुझे अपनी रूह में बसाना है

वक़्त निकल गया आगे, मैं रह गया पीछे मोड़ पे |
अब भी मैं खडा हूँ वही, जहाँ से गयी थी तू मुझे छोड़ के |
तेरा इंतज़ार करूँगा मैं, ये मेरा वादा है |
सासों के बंद हो जाने पर भी, तेरा साथ निभाने का इरादा है |
मोहब्बत क्या थी, क्या है? तेरे रहते मैं ये जान ना सका |
तू कब कुछ से सब हो गयी, मैं ये पहचान ना सका |
पर अब मैं तुझे कहीं जाने ना दूंगा |
तेरे एहसास, तेरी याद को मुझे सताने ना दूंगा |
पानी की इक बूँद सी, अब मुझ मिट्टी में तू मिल जायेगी |
रब भी ख़ुशी से गायेगा, जब तू मेरी रूह में बस जायेगी |

तब तू दूर भी होगी, तब भी पास ही रहेगी |
दो पावन मनों के मिलन से, जब ये दुनिया सजेगी |
तब सिमट जायेंगे सब इम्तिहान, जो जीवन ने हैं अब तक लिए |
पंची छेड़ेंगे ताल और पेड़ लादे फूल खड़े होंगे हमारे लिए |
तब लगेगा की तेरे बिन बिताया वक़्त भी था शायद इसी पल के लिए |
और खुदा ने भी की थी साजिश, हमारी रूह के मिलन के लिए |


Updated: May-2009

Email : vishwas@kaavyanjali.com