Kaavyanjali Ek Saprem Bhent............









 



बस तुम इतना करना साथी................
जब अंतर्मन दुखी हो उठे
ठुकरा दें मुझको अपने ही
सच्चाई की आशा देकर
झूठे हो जाये सपने ही
उम्मीदें मुँह मोडें मुझसे
करे मित्रता जब तन्हाई
और रूठकर दूर चली जाये
मुझसे  मेरे परछाई
तब अहसासो के कौने ने, अपनी यादें भरना साथी
बस तुम इतना करना साथी .................
 

दीप बुझें, आशाये टूटें
आंसू जब उतरे आंखो से
मधुमासी चेतनता छूटे
जब भी हरित ह्रदय पाखो से
बुझ जाये जब दीप द्वार के
आँगन मे पसरें सन्नाटे
पुष्प झरें, रोये बहार भी
चुभते रहें पाँव मे काटे
तब तुम मेरे सूने मन मे, बनकर नेह विखरना साथी
बस तुम इतना करना साथी ...................
 

जब मेरा तन शिथिल शिथिल सा
हो जाये असमर्थ धरा पर
रह न जाये शेष तनिक भी
जब मुझमे सामर्थ धरा पर
जब मेरे जीवन जीने का
कोई न निकले अर्थ धरा पर
जब मेरी सासे ही मुझको
लगें समझने व्यर्थ धरा पर
तब करके स्पर्श मुझे तुम, मेरा जीवन तरना साथी
बस तुम इतना करना साथी .............

Updated: Jan-2010

Email : vishwas@kaavyanjali.com