Kaavyanjali Ek Saprem Bhent............









 


 

इंसान  से  इंसान  की  तकरार  के  मंजर ,
तेरे  सब्र  पे  भारी  तेरे  बन्दुक  और  खंजर ,
ये  रोष  तेरे  दिल  में  अब  आम  देखता  हूँ ,
हर  शहर  हर  गली  में  कोहराम  देखता  हूँ .

इंसानियत  के  जैसा  कोई  दौर  भी  कभी  था 
उस  युग  की  इस  घडी   में  पहचान  देखता  हूँ
भगवान  की  तो  आस  मेने  छोड़  ही  अब  दी  हे 
इंसानों  की  दुनिया  में  इंसान  देखता  हूँ


 

Updated: Mar-2011

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