Kaavyanjali Ek Saprem Bhent............









 



विष भरी अंधी हवा अब रोकना है
धुंध के अस्तित्व को भी टोकना है

गर करे खिलवाड मौसम, मौसमौं से
मोतीयों सी ओस फिर कैसे रहेगी
हर तरफ हो जायेगा मरुथल जगत में
यह  तरल गंगा भला कैसे बहेगी

शत्रुता माली, चमन से जब निभाये
फूल शाखों पर भला क्या खिल सकेगा
नफरतों की जब प्रतिष्ठा हो असीमित
प्रेम फिर कैसे दिलो से मिल सकेगा

कर रहे उल्लूक पूजा मन्दिरों में
प्रेम मूरत किस तरह पावन रहेगी
हर तरफ हो जायेगा मरुथल जगत में
यह  तरल गंगा भला कैसे बहेगी

ज़ुल्म बढता ही रहे जब पापियों का
अग्नि, क्या देगी सहारा कोपलों को
किस तरह सीता हरण रोकेगा लक्ष्मण
कर रहा हो, भस्म रावण जब युगों को

राम का लक्ष केवल स्वर्ण मृग है
फिर भला सीता ये दुख कैसे सहेगी
हर तरफ हो जायेगा मरुथल जगत में
यह  तरल गंगा भला कैसे बहेगी

शुभ्रता की अर्थियाँ जलने लगें जब
हो न जाये, क्यों न मन का द्वार सूना
देह के सम्बन्ध जब भी पल्ल्वित हों
हो न फिर क्यों नेह का अधिकार सूना

संस्कारों पर हसें जब वासनायें
फिर न कैसे शाम आशा की ढहेगी
हर तरफ हो जायेगा मरुथल जगत में
यह  तरल गंगा भला कैसे बहेगी

कर रहे हो ज़ुल्म तुम सब पर निरंतर
और खुद रहना सुरक्षित चाह्ते हो
लिख रहे हो  कर्म सारे अनापेक्षित
और खुद होना सुगन्धित चाहते हो

आत्मा जब तक न गंगा मे नहाये
भावना फिर किस तरह शोभित रहेगी
हर तरफ हो जायेगा मरुथल जगत में
यह  तरल गंगा भला कैसे बहेगी

Updated: Jan-2010

Email : vishwas@kaavyanjali.com