Kaavyanjali Ek Saprem Bhent............









 



मेरे सपनों का भारत कैसा हो?
हां वो ऊँचा हिमालय के जैसा हो
जिसके होने से धरती का सीना तने
,
मुस्कुरा दे आसमां भी कुछ ऐसा हो
सर-सब्ज हो इसकी पावन जमीं
,
कुदरत की कोख में ये संवरता रहे,
प्रकृति घायल न हो इस प्रांगन में कभी,
सुलगती रेत पे भी बादल बरसता रहे
कोई बंधन न हो कोई अड़चन न हो
,
इसके आँचल की खुशबू हरेक को मिले
जाति- धर्मो के बंधन से बेहद परे
,
इसके साये में बस प्यार ही प्यार पले
देश की सत्ता जनता के हाथो में हो
गणतंत्र की मिठास फिजा में फ़ैली रहे
मिट जाए जौरो-सितम का नामोनिशा
हर मुसीबत की ऊंची दीवारे ढहे
यहाँ बचपन हो रौशन
शिक्षा के दीये में
नौजवां जीवनभर आत्मनिर्भर रहे
बढ़ते कदमों के आगे कोई बंदिश ना हो
हर तरफ़ ज्ञान की पवित्र गंगा बहे
इसके आँगन में रोज फूल खिलते रहे
गांधी-सुभाष यूं
ही इससे मिलते रहे
मलाल ना हो यहाँ पे किसी से किसी को
जख्म जो भी मिले
, मिलकर सिलते रहे
विज्ञान का भविष्य इसका
वर्तमान हो,
आविष्कारों के जनक इसके संतान हो,
क्षमताओं का क्षेत्र इतना व्यापक बने ,
ये दुनिया के देशो का भगवान हो
इतना होकर भी ये सबका साथी रहे
मानव-मूल्यों की रक्षा यहाँ लक्ष्य हो
इसकी आभा से रौशन हो सारा जहाँ
आगे बढ़ने का मौका सबके समक्ष
हो

Updated: Mar-2010

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