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आने बाला कल........ नव वर्ष का पहला दिन ............
लेकिन किस तरह हो खुशियों की यथार्थ अभिव्यक्ति ............तमाम
परिस्थियों के बीच .........
जब
कभी आशा-निराशा क्षोभ से
जिन्दगी रोये, किसी की, दोस्तों
जब कभी खोये किसी की आरजू
जब कभी पानी फिरे उम्मीद पर
वो कि जिनके घर कभी पहुंची नही
सूर्य की किरणें, किरण की लालिमा,
वो कि जिनकी कामना सूनी रही
वो कि जिनका भाग्य चेता ही नही
वो कि जिनके दुख पहाडों की तरह
वो कि जिनकी आत्मा टूटी हुई
वो कि जिनसे हर खुशी रूठी हुई
पीर ही जिनकी जडी- बूटी हुई
कुछ हैं वो जिन पर कहर बरपा हुआ
कुछ है वो जिन पर गरीवी बोझ है
कुछ है, जो बीमार हैं लाचार हैं ,
कुछ है वो जिनके न अपने हैं कोई
कुछ कि जिनके तन पे कपडे ही नही
कुछ कि जो जी-जी के मरते है यहाँ
कुछ कि जिनसे बक्त ने छीना है सब
कुछ कि जिनकी रात कटती जागकर ......
कुछ कि जिनकी उम्र ही दस वर्ष है
सर से साया हट गया माँ- बाप का
कुछ अनाथालय मे सपने देखते
कल उडेंगे एक पंक्षी की तरह ...........
कुछ दुकानों पर लगे है चाय की
कुछ कमाते हाथ- ठेला खीचकर
कुछ मशीनों की तरह ज़िन्दा हैं अब
कुछ खदानों के सफर के साथ हैं
दूसरा भी एक कडवा सच सुनें
क्या न करवाती यहाँ मजबूरिया
रात होती नंग्न, बिस्तर पर कहीं
सिर्फ दो रोटी कमाने के लिये ............
खुद ही मर्यादा स्वयं को तोडती
खुद ही अंधी हो रही है सभ्यता
क्या मनुजता के नियम अपनायेगा
कोई भूखा, जिसको रोटी चाहिये ..........
कुछ तवाही से
हुए बेहाल हैं
कुछ के छप्पर उड गये तूफान मे
कुछ की फसलें खा गई हैं बारिशें
कुछ को सदमा बम- धमाकों का लगा ...................
हर गली के दस घरों में शोक है
एक घर मे हर्ष है तो हर्ष क्या
भूख ही जब व्याप्त है हर पेट में
फिर भला नव वर्ष ही नव वर्ष क्या ............
दुधमुहा बच्चा ही बिलखे देश में
तब कोई उत्कर्ष भी उत्कर्ष क्या
होंठ हस ले, पर हृदय रोता रहे
फिर भला नव वर्ष ही नव वर्ष क्या
बाप
की चिंता है बेटी का विवाह
माँ समझती है कि
“है
संघर्ष क्या”
और उस पर भी जलें घर में बहू-
फिर भला नव वर्ष ही नव वर्ष क्या
सोचता हूँ, प्राणियों के दर्द को-
कर भी पायेगी दवा स्पर्श क्या
जख्म जब नासूर बन बन कर बहे
फिर भला नव वर्ष ही नव वर्ष क्या ..............................
“
दिलों के दर्द को खुशियों में पिरोयें तो न्यू ईयर होगा
किसी की टूटती सासों को सजोयें तो न्यू ईयर होगा
अगर हो खुश तो दुआ में बदल दो सभी गिले- शिकवे
जमीं पे प्यार की फसलों को बोयें तो न्यू ईयर होगा
“
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असीम भावनाओं के साथ नव वर्ष की मंगल कामनायें
कवि अंशुल नभ की भावनाओं के साथ ...............
Updated: Jan-2010 |